एक सच जो मैने जिया

 बस आज कल की ही बात मानिए, एक सच जो हम सुनते है अनुभव करते है पर उसे याद नहीं रखते। अक्सर कहानियों में सुनते है, आज कल इस दौड़ती भागती दुनिया के इस आधुनिक समय में अक्सर खाली समय में मोबाइल देखते हुए किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म में अक्सर देखा होगा पर कुछ पल होते है जो जब तक हम पर न गुजरे हमें वो सच नहीं लगता।

एक ऐसा ही पल जब मेरे सामने आया तो मुझे भी अनुभव हुआ कि आधुनिकता की दौड़ में हम अपने से , अपने अपनों से, अपने आने वाली पीढ़ियों से कितना कुछ छीन लेते है। 

मेरी कहानी छोटी है पर उसका मेरे मस्तिष्क पर छाप बहुत ज्यादा है उसकी,  एक रोज की बात है मेरे मित्र का मुझे फोन आया उसका कुछ काम था शहर के बाहर तो उसने मुझे भी साथ चलने को कहा मैं शायद खाली था रविवार का दिन था दफ्तर की छुट्टी भी थी । घर पर भी  कोई खास काम न था तो मैने उसे हां कर दी और कुछ देर में हम निकल पड़ते है । अप्रैल का महीना था कुछ समय पहले ही गर्मी ने दस्तक दी थी मौसम गर्म था पर उतना गर्म नहीं कह सकते जितना हमें देखने की आदत है । 

मैने आपको बताया ही नहीं कि मैं उत्तर प्रदेश में एक शहर है कानपुर वहां पर मेरा निवास हैं, कानपुर एक ऐसा शहर जो अपने आप में बहुत खास है गंगा मैया की समीप बसा यह शहर अपने अल्हड़पन में खोया हुआ , इसकी खुशमिजाजी बाकी कहीं नहीं मिलेगी आपको, आप कही भी चले जाए इसको अपने दिल और दिमाक से नहीं निकाल सकते।  इस शहर का इतिहास अपने आप में खास है, बह्मा जी की खूंटी का रहस्य हो या महर्षि बाल्मीकि जी का आश्रम, जहां माता सीता ने अपने पुत्रों लव- कुश को जन्म दिया था , पौराणिक कथाओं से भरा हुआ शहर है कानपुर। पूर्व का मैनचेस्टर कह लीजिए  या 1857 की क्रांति का साक्षी , जहां रानी लक्ष्मी बाई ने अपना बचपन बिताया , बहुत  कहानियां, बहुत सारी बातें है कानपुर की। 

चलिए अपनी बात पर आते है हम थे अप्रैल महीने के गर्मी पर, उतना तो गर्म नहीं था मौसम जितना अक्सर मई और जून के महीने में हो जाता है पर मौसम में गर्म था धूप भी अपने पूरे चरम पर थी। हवा जो अभी कुछ समय पहले हल्का  ठंडक का एहसास दिलाती थी अब गर्म थपेड़ों सी लगती थी। हमारा पहुंचना हुआ शहर से बाहर कुछ दूर पर मेरे मित्र की एक जमीन पर , जमीन जो खाली पड़ी हुई थी काफी समय से उस पर कुछ नहीं हुआ था न ही कोई निर्माण न ही कोई फसल की तैयारी बस ऐसे ही पड़ी हुई थी। काफी समय से ऐसे पड़े होने के कारण उस पर बड़ी बड़ी  घास निकल आई थी , आस पड़ोस में रहने वालों ने वहां पर कूड़ा फेंकने के वजह से बहुत गंदगी इक्कठा हो गई थी वहां। जैसा कि आप सोच रहे है हमारा वहां जाने का मकसद वही है  उस जमीन को साफ करना । मेरे मित्र ने एक गाड़ी वाले ( जेसीबी) से उस जमीन को साफ करने की बात कर ली थी । गाड़ी वाला अपने समय से वहां पहुंच गया था हम भी तय समय पर वहां पहुंच गए। 

धीमे धीमे सूर्य देव अपना तेज बढ़ाने लगे, पहले तो हमे कोई समस्या नहीं हुई पर कुछ देर में धूप अब हमें असहनीय सी लगने लगी। सूर्य भगवान के तेज के समक्ष कौन टिक पाया है और हम निर्बोध प्राणी कहां और कब तक टिक पाएंगे , समय के साथ गर्मी और धूप बढ़ने लगी तो अब दिमाक ने सोचना शुरू किया कि ऐसे तो हम लोग ज्यादा समय नहीं खड़े रह सकते। चाहे आप कार के अंदर एसी चला कर बैठे पर पर जब सूर्य देव अपना तेज बरसाते है तो उस कार को भी कही कोई छांव चाहिए होती है, हम मनुष्यों को भी बारिश हो धूप हो ठंड हो छांव की जरूरत पड़ती है। छांव चाहे पेड़ की हो या किसी मकान की , फिलहाल हम जहां थे वहां मकान तो दूर दूर तक कोई नही था तो फिलहाल पेड़ ही हमारी छांव की व्यवस्था था पर उस जगह पर आस पास कोई पेड़ भी नहीं दिखा। 

ऊपर से क्रोध बरसाते सूर्य देव और उनकी आग में जलने सा महसूस हो , कुछ दूर पर हमें एक पेड़ दिखाई दिया जो एक खेत के बीच में था हमने वहां पर खड़ा हों तय किया , वो पेड़ हमारे लिए किसी ऑक्सीजन से कम नहीं था जिसने हमे एक नया सहारा दिया था, पेड़ ज्यादा बड़ा नहीं था पर इतना बड़ा था कि हमें अपनी छांव से बचा सके सूर्य देव की तपिश से उस आग से जो सूर्य से निकलती है गर्मी के महीनों में , उस पेड़ की छांव में बैठ कर मुझे ये ख्याल आया, हम अपनी ज़रूरतों के लिए प्रकृति का जिस तरह से दोहन कर रहे है जिस तरह से जमीनों पर से पेड़ हटा रहे हैं यह हमारे लिए हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए कितना नुकसान दायक है। 

अगर हमारे घर के सामने कोई पेड़ होता है तो हम उस पेड़ को कटवा कर हटवा देते है, कहते है कि हमारा घर दिखाई नहीं दे रहा था उस पेड़ की वजह से, घर पर किया गया पेंट खराब हो रहा , हमारे गाड़ी के लिए जगह नहीं है उसको हटाने से हम अपनी गाड़ी घर के सामने खड़ी कर पाएंगे, बहुत सी वजह देते है उस पेड़ को हटाने की पर क्या वो पेड़ हटा पर आप उसकी भरपाई कर पाएंगे। गमलों में आप पेड़ लगाएंगे उसको सुबह शाम पानी देंगे, समय से खाद देंगे नए नए तरीके ढूंढेंगे की वो गमले में लगा हुआ पेड़ सूखे नहीं पर क्या घर के सामने लगा हुआ पेड़ हमें बोझ लगने लगता है। 

मुझे याद है हमारे पड़ोस में रहने वाले एक सज्जन ने अपने घर के सामने लगा हुआ एक पेड़ जिसको हटाने के लिए क्या क्या नहीं किया , पहले पेड़ की सारी शाखाएं कटवा दी और कोई आपत्ति न कर सके तो धीमे धीमे चुपके से केमिकल की मदद से उस पेड़ को इतना कमजोर कर दिया कि वो खुद ही मर जाए, क्या ये एक हत्या नहीं है उस जीते जागते पेड़ की सिर्फ इस वजह से कि उनका घर पर कराया हुआ काम और पैसा दिखाई दे उनकी गाड़ी के लिए स्पेस बन सके। आधुनिकता के आड में सैकड़ों पेड़ काट दिए जाते है । किसको फिक्र है किसी को नहीं , हमारे जीवन का महत्वपूर्ण अंग है ये ऑक्सीजन देने वाले पेड़ , हमारे वातावरण को शुद्ध रखने वाले ये पेड़ , भयंकर बारिश से बचने वाले ये पेड़ , गर्मी में धूप से बचने वाले ये पेड़ ,हमें बचाने वाले ये पेड़। हमारा भी दायित्व बनता है इनको बचाए ।

मेरी कहानी में कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे कहानी कहा जाए बस मेरी एक फिक्र है मेरे बाद आने वाली पीढ़ियों के लिए, आज जो मौसम है जो, जिसकी वजह से आपदाएं आ रही है, कितने लोगों की जान जा रही है, मृत्यु सत्य है संतुलन के लिए, पर क्या ऐसी मृत्यु सही है? जो हमारी ही गलतियों की वजह से हमारे साथ के लोगों को मिलती है उसमें कोई हमारा भी हो सकता है।

मेरा इतना बड़ा पत्र लिखने का सिर्फ यही एक विचार है प्रकृति को बचाए, चाहे छोटा सा पर कोई यजदान जरूर दे अपने , अपनों और प्रकृति के हित में।

 धन्यवाद मित्रों यहां तक पढ़ने के लिए आपको बहुत बहुत आभार।।

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